गंगा जमुना सरस्वती के शहर का वासी हूं मैं , दिल में तेह्जीबों का तरकश रखता हूं , जिसमें गंगा जमुनी तहजीबों के बाण तो है ही साथ ही साथ सरस्वती नामक बौद्धिक ज्ञप्ती वाला ब्रहमास्त्र भी है । 
जिस शहर का अध्यात्म गीता उपनिषद बाईबल कुरान से होते हुए मानवता के मूल ज्ञान तक विकसित है । जहां आज भी वसुदेव कुटुम्भ्कंम का नारा अटल है । आज मेरी एक कोशिशउस शहर के नाम जिस शहर को शायद आज से 444 वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों ने प्रयाग के नाम से प्यार किया हो पर मैने तो सिर्फ इलाहाबाद के नाम से ही जाना और माना है , जो जज्बात उनके लिये प्रयाग को लेके होंगे,मेरे लिये वो जज्बात इलाहाबाद के लिये है, हो सकता है आने वाली पीढ़ी अपने को प्रयागराज के नाम से जोड़े पर मैं सिर्फ और सिर्फ इलाहाबादी के नाम से सम्बोधित होना चाहूँगा, मरते दम तक !!!

परिवर्तन प्रकृती का नियम है और मैं एक लेखक हूं और एक लेखक वो होता है जो इतिहास के शिलालेख पे भविष्य की स्याही से वर्तमान का परचम लहराता है ,इसिलिए मेरे आने वाले भविष्य के लिये मेरा ये कर्तव्य है की मैं इस बदलाव को स्वीकार करुँ परंतु मैं अपने आप को आज भूत में ही रखूँगा क्युंकि मेरे लिये जैसे भारत का नाम कुछ भी हो जाये मैं भारतवासी ही रहूँगा वैसे ही मेरे शहर का नाम जो भी रख लो आप मैं इलाहाबादी था इलाहाबादी हूं और इलाहाबादी रहूंगा

प्रथम यग से प्रयाग हुआ था 
था जो वेदो का वर्णन 
तीन नदी का हुआ आगमन 
नाम पड़ा तब संगम
आयी दुल्हन सी उर्दू
हुआ सांस्कृतिक समागम
फिर गंगा जमुनी तहजीब ने
बुना एक सुरमई बंधन 

यग से जो प्रयाग बना था 
हुआ अल्लाह से आबाद जब
संगम की नगरी का
नाम पड़ा इलाहाबाद तब

गंगा सी शीतल धुन थी
जमुनी अल्फाज थे
बौद्घिक धरा पे समतल 
सरस्वतिक ज्ञान से अबाद थे
नाम में ही तो संगम था
हमारे इलाहाबाद के

लेखक : श्लोक रंजन श्रीवास्तव